Thursday, 15 December 2016

जैव-प्रौद्योगिकी : खतरे की आहट भी


जैव-प्रौद्योगिकी : खतरे की आहट भी


वैश्विक स्तर पर जैव-प्रौद्योगिकी की वर्तमान प्रगति को देखते हुए तो ऐसा प्रतीत होता है कि वर्तमान सहस्त्राब्दी ‘बायोटेक मिलेनियम’ होगी, क्योंकि असंख्य एवं अपार मनु-पुत्रों की क्षुधा शांति, स्वास्थ्य एवं जीवन रक्षा में निश्चय ही जैव-प्रौद्योगिकी की निर्णायक भूमिका रहेगी। परंतु, जैव-प्रौद्योगिकी के कई विवादित पहलू भी बन गए हैं।

टर्मिनेटर प्रौद्योगिकी : खतरे की घंटी

हम सभी जानते हैं कि किसी बीज को अनुकूल उपजाऊ भूमि में बोने से पौधा अंकुरित होता है। यह पौधा अपनी प्रजाति के पौधों का विस्तार करने में सक्षम बीजों का उत्पादन करता है। वस्तुत:, बीज से पौधा और पौधे से पुन: बीज प्राप्त करने का यह चक्र सदियों से यों ही चलता आया है, परंतु 3 मार्च, 1998 को अमेरिका में पंजीकृत कराए गए एक पेटेंट में प्रकृति के इस चक्र को रोकने का प्रावधान है। ‘डेल्टा एंड पाइनलैंड’ कंपनी तथा अमेरिकी कृषि विभाग द्वारा कराए गए पेटेंट में पौधों में जीन अभिव्यक्ति को नियंत्रित करने का तरीका पंजीकृत कराया गया है। इस तकनीक के अनुसार, किसी भी पौधे में कुछ इस प्रकार के जीन डाले जा सकते हैं जिससे उस पौधे की अच्छी फसल तो प्राप्त की जा सकेगी, परंतु इसके बीज नई पौधे देने में अक्षम होंगे, अर्थात इन पौधों के डीएनए अपने ही अंकुर का वध करेंगे।

पौधों को वंध्यता प्रदान करने वाली यह तकनीक जैव-प्रौद्योगिकी की ही देन है। जैव-प्रौद्योगिकी द्वारा किसी जीन की क्रिया को रोकना या चलाना एक ऐसी विशेषता है, जो वस्तुत: जनसाधारण के लाभ का कारण बनती है, परंतु इस तकनीक में विपरीत स्थिति है, जो विवादित बन चुकी है। इस कारण व्यंग्यस्वरूप इसे ‘टर्मिनेटर’ यानी ‘समापन तकनीक’ की संज्ञा दी गई है। इस समापन तकनीक में डीएनए की तीन विशेष रचनाएँ इस प्रकार किसी पौधे में समाहित की जाती हैं कि पौधे के बीज में अपने अंकुर को नष्ट करने के गुण आ जाते हैं। इन बीजों को बेचने से पहले इन्हें टेट्रासाइक्लीन के संपर्क में लाया जाता है, जिससे इनमें वंध्यता की प्रक्रिया आरंभ होने लगती है।

आज विश्व में टर्मिनेटर तकनीक को लेकर बहुत गहमागहमी का वातावरण है। विश्व के सभी वैज्ञानिकों का इस बारे में एक मत है कि यह तकनीकी प्रकृति के साथ खिलवाड़ है जो भविष्य में बहुत महँगी साबित होगी। यह किसानों के लिये भी हितकारी नहीं है, विशेषत: विकासशील देशों के किसानों के लिये तो यह बिल्कुल ही अनुकूल नहीं है। इस प्रणाली से एक समस्या यह भी हो सकती है कि यदि पूरे विश्व में समान जीव वाली फसलें उगने लगेंगी तो विविधता समाप्त हो जाएगी और फसलों के लुप्त होने का खतरा बढ़ जाएगा, क्योंकि समांग फसलें महामारियों के प्रति अधिक संवेदनशील होंगी। पर्यावरणविदों के अनुसार, टेट्रा-साइक्लीनयुक्त बीज जब बार-बार बोए जाएँगे तो वे मिट्टी में उपस्थित लाभदायक सूक्ष्म जीवों को नष्ट कर मृदा की उर्वरा शक्ति को घटाएँगे।

हमारे देश के अन्तरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कृषि वैज्ञानिक डॉ. एमएस स्वामीनाथन ने इस तकनीक को अनैतिक करार देते हुए यह आशंका व्यक्त की है कि इस तकनीक को अपनाने से देश की खाद्य व्यवस्था को खतरा उत्पन्न हो जाएगा।

अमर जीवाणु

जैव-प्रौद्योगिकी द्वारा ऐसे जीवाणु बनाए जा सकते हैं, जिन पर दवाओं या एंटीबायोटिकों का कोई प्रभाव न हो। यदि ऐसे जीवाणु सृजित कर लिये गए और किसी प्रकार वे परखनली तथा प्रयोगशाला से बाहर आ गए तो इस पृथ्वी पर जीवन खतरे में पड़ सकता है। इसी तरह विषाक्त पदार्थ उत्पन्न करने वाले ऐसे जीवाणु खुले छोड़ देने पर पर्यावरण में विष घोल सकते हैं। इसी प्रकार विभिन्न रोगों के जीवाणु संवर्धित होकर यदि किसी प्रकार बाहर निकल भागे तो फिर हम लोग कहाँ भागकर जाएँगे? आज जैव-तकनीक द्वारा कैंसर कोशिका और जीवाणु या विषाणु कोशिका को क्लोनित कर जीवाणु मनुष्यों में पहुंच जाएँ तो इनसे मनुष्य में कैंसर उत्पन्न हो जाएगा।

जैविक युद्ध एवं जैविक

आयुधमानव सदैव युद्ध की आशंकाओं से घिरा रहा है। आज विश्व के सभी बड़े राष्ट्रों के पास विभिन्न क्षमता वाले आयुध हैं। प्राचीन काल के बेडौल शिला प्रक्षेपकों तथा तीर-तलवारों का स्थान आज नाभिकीयबमों और मिसाइलों ने ले लिया है। वर्तमान में अनेक देशों के शस्त्रागारों का सबसे आधुनिक हथियार है ‘जैविक हथियार’, जो बहुत छोटे से समय में एक बड़ी जनसंख्या को प्रभावित करने की क्षमता रखता है।

सामान्यत: एक आम आदमी की दृष्टि में जीवाणु, विषाणु या कवक प्राकृतिक रूप में मिलने वाले सूक्ष्म जीव हैं। जीवाणुओं के विषय में प्राय: यह समझा जाता है कि ये किसी बड़ी विपत्ति के सृजन में सक्षम नहीं हैं, परंतु इतिहास साक्षी है कि जीवाणुओं द्वारा संक्रमण बहुत विनाशकारी हुआ है। जैविक युद्ध का अर्थ है दुश्मन की सेना, आबादी, खाद्य स्रोत तथा पशुधन को हानि पहुँचाने या नष्ट कर देने के लिये रोगोत्पादक कारकों का प्रयोग। पहले जैव हथियार रोमवासियों द्वारा प्रयुक्त किया गया था। प्राचीन रोमन लोग अपने शत्रुओं के कुँओं में जहर डाल देते थे। 606 ई. पूर्व असीरियनों ने अपने पतन से पूर्व फफूंदग्रस्त राई का प्रयोग कर शत्रुओं को शिथिल करने का प्रयास किया था। ऐसे खाद्य पदार्थ का सेवन करने से गैंग्रीन, गर्भपात, मानसिक विभ्रमता आदि रोग हो जाते हैं। विष-बाण का प्रयोग तो हमारे पुराणों में भी उल्लेखित हैं। सन 1347 में टारटर लोग प्लेगग्रस्त मृतकों को कफ्फा शहर की दीवारों के पार फेंक देते थे। सन 1941-42 में संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, रूस एवं चीन में भी प्लेग, एंथ्रेक्स, कॉलेरा आदि घातक जीवाणुओं का प्रयोग युद्ध में किया गया। जैविक हथियारों की दौड़ के चलते जापान ने भी अनेक जीव तथा वनस्पतिनाशक हथियार बनाए, जिससे अमेरिका एवं सोवियत संघ की प्रमुख फसलें नष्ट हो सकें।

जैव हथियार दो प्रकार के हो सकते हैं - जीवित और अजीवित। इनमें से कुछ आसानी से उपलब्ध हो सकते हैं और भीषण त्राहि मचा सकते हैं, जबकि कुछ सीमित रूप से प्रभावित करते हैं, अर्थात कुछ समय के लिये व्यक्ति को अपंग या असहाय बना सकते हैं। जीवित वर्ग में एंथ्रेक्स, चेचक, प्लेग आदि के जीवाणु या स्पोर तथा अजीवित पदार्थों में बॉटुलिन, एंटरोक्सिन इत्यादि हैं।

वस्तुत: जैव हथियार का प्रभाव कई बातों पर निर्भर करता है- जैसे वायु का रूख या दिशा, मौसम, तापमान, आर्द्रता आदि। जीवाणुओं का एक हथियार मध्यम हवा के चलते लगभग 1 लाख लोगों को प्रभावित कर सकता है। इसके अतिरिक्त व्यक्तिगत या आनुवंशिक, जैसे- शरीर की प्रतिरोधक क्षमता पर भी इनका प्रभाव निर्भर करता है। कुछ प्रतिवेदनों के अनुसार, पचास से अधिक आयु वाले लोगों की प्रतिरोधक क्षमता कम होती है। अत: जीवाणु की कम सांद्रता में भी उक्त आयु वर्ग के लोग जल्दी प्रभावित हो जाते हैं।

जैविक हथियारों के गुण एवं दोष

जैविक अस्त्रों की उच्च एवं विलक्षण मारक क्षमता के बारे में प्रिटोरिया (दक्षिण अफ्रीका) स्थित ‘पादप संरक्षण संस्थान’ के पादप रोग विशेषज्ञ डॉ. जेई वान, डैर प्लांक का कहना है कि विश्व की किसी भी सेना के पास शायद ही कोई ऐसा विस्फोटक हो जो इन जीवाणुओं से शक्तिशाली हो। अनुमान है कि एक ग्राम टॉक्सिन से 1 करोड़ लोग मारे जा सकते हैं। बोटुलिन नामक टॉक्सिन रासायनिक नर्व गैस सैरिन की तुलना में 30 लाख गुना शक्तिशाली है। यदि इस टॉक्सिन को स्कड मिसाइल में भरकर युद्ध क्षेत्र में डाल दिया जाए तो 37000 किमी2 क्षेत्रफल को प्रभावित कर सकता है, जो सैरिन की तुलना में सोलह गुना अधिक क्षेत्रफल होगा।

जैविक आयुधों का एक गुण यह भी है कि जीवाणु, कवक या विषाणु को हथियार के रूप में प्रयोग करने के लिये किसी विशेष तकनीकी की आवश्यकता भी नहीं है। कुछ दशक पूर्व अमेरिकी मूल के लोगों को चेचक से प्रभावित करने के लिये ब्रिटेन ने चेचक के विषाणुयुक्त कंबलों का प्रयोग किया था जिससे काफी बड़ी जनसंख्या प्रभावित हुई थी, क्योंकि उन्हें चेचक के रक्षात्मक टीके नहीं लगे थे। वैज्ञानिकों का ऐसा मानना है कि जिन देशों के पास नाभिकीय अस्त्र नहीं हैं वे भी बहुत कम खर्च में इस प्रकार के विनाशकारी हथियार बिना किसी कठिनाई के बना सकते हैं और संवाहक के रूप में वायु का उपयोग करके मनुष्य को हानि पहुँचाने वाले इस प्रकार के सूक्ष्म जीवों द्वारा थोड़े समय में ही विशाल मानव जीवन को क्षति पहुँचा सकते हैं।

जैविक अस्त्रों के संदर्भ में एक भयभीत करने वाला तथ्य यह भी है कि ये ऐसे हथियार हैं जिनके प्रयोग में न तो गोलियाँ चलेगी, न ही धमाके होंगे, न ही रेडियो धर्मिता फैलेगी, न ही बारूदी सुरंगों के फटने से अंग विच्छेदन होगा - बस, गुप्त रूप से लोगों की मृत्यु होती रहेगी। इनके प्रयोग से एक समस्या यह भी होगी कि समय रहते इनसे बचाव करना भी लगभग असंभव है, क्योंकि इनके स्रोत का पता लगाना भी संभव नहीं है। यदि जैविक अस्त्रों द्वारा रोगों के माध्यम से प्रत्यक्ष रूप से मानव जीवन को क्षति न भी हो तो भी अपर्याप्त पोषण के कारण पूरे देश की जनता को अशक्त बनाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त आंतकवादी संगठन भी इन अस्त्रों का उपयोग कर जनहानि कर सकते हैं।

‘एन्थ्रेक्स’ एक ऐसा रोग है, जो एक जीवाणु ब्रसिलस एंथ्रेसिस के वायु में उड़ने से उत्पन्न होता है। इन जीवाणुओं को प्रयोगशाला में बहुत आसानी से विकसित किया जा सकता है तथा शुष्कावस्था के कणों के रूप में रखा जा सकता है। एन्थ्रेक्स तीन प्रकार से संक्रमण फैलाता है - श्वसन की शुष्क कणिकाओं द्वारा, शरीर के विभिन्न भागों की त्वचा पर पड़ी खरोचों के संपर्क द्वारा तथा संक्रमित पशुओं का अधपका मांस खाने से आंतों द्वारा। आंतों की भारी सूजन, जी मिचलाना, भूख का मर जाना, तेज बुखार, आंतों के एंथ्रेक्स की प्रांभिक लक्षण हैं। सिप्रोफ्लोक्सेसिन एवं डोक्सीसाईक्लीन एंथ्रेक्स की रामबाण औषधियाँ हैं।

आंतकवादियों द्वारा जैविक हथियारों में एंथ्रेक्स का चुनाव इसलिये किया गया, क्योंकि इसके जीवाणु कड़ी धूप, कीटनाशक दवाओं तथा तेज गर्मी को भी सरलता से वहन कर लेते हैं। आंतकवादियों का लक्ष्य होता है कम से कम प्रयास में अधिकाधिक लोगों को नुकसान पहुँचाना, इसीलिये एंथ्रेक्स को चुनकर आतंकवादी इस बीमारी के विषाणु पाउडर की तरह किसी पत्र पर चिपका कर भेजते हैं। जैविक आतंकवादी शस्त्र रूपी रोगाणु प्रयोगशला में बड़े पैमाने पर विकसित एवं उत्पादित किये जा सकते हैं। एबोला विषाणु को भी एयरोसॉल के रूप में आयुधीकृत किया गया है। इससे रोगी को अत्यधिक उच्च ताप, विभिन्न अंगों से रक्तस्राव तथा निम्न रक्तचाप आदि कष्ट प्राप्त होते हैं। इसकी मृत्यु दर 65 से 80 प्रतिशत होती है।

इसी प्रकार मायकोटॉक्सिन टी-2 भी एक घातक विष है। यह जल अथवा खाद्य पदार्थों में मिलकर कहर ढा सकता है। सैक्सीटॉक्सिन तो और भी घातक है। यह वायु माध्यम से कार्य करता है और चौबीस घंटे के अंदर शिकार को पक्षाघात से अशक्त कर मौत के मुँह में धकेल देता है। एक बैक्टीरिया द्वारा स्रावित प्रोटीन विशेष रूप से तैयार किया गया बोट्यूलिनम भी कम नहीं है। चौबीस से छत्तीस घंटों की अवधि में यह मनुष्य को पूरी तरह पक्षाघात से आक्रांत कर देता है तथा श्वसन में असमर्थता होने के कारण रोगी की मृत्यु हो जाती है।

यदि रणक्षेत्र में क्लॉस्ट्रीडियम परफिंजेन बैक्टीरिया की बरसात दुश्मन की टुकड़ियों पर कर दी जाए तो सैनिकों के घावों में आठ से बारह घंटों में गैस गैंग्रीन उत्पन्न हो जाते हैं। यदि भोजन या जल के माध्यम से इसे शरीर के अंदर पहुँचाया जाए तो यह भोजन विषाक्तता भी उत्पन्न कर सकता है। बैसीलस बुर्खोलडेरिया द्वारा उत्पन्न ग्लैंडर्स रोग भी वायु के माध्यम से आक्रमण के लिये उपयुक्त है। यह नाक की श्लेष्मा झिल्लियों में इतना विकार उत्पन्न कर सकता है कि कुछ दिनों में ही मनुष्य की मृत्यु हो जाती है।

जैव हथियारों का दोष यह है कि इनके प्रभाव के बारे में भविष्यवाणी नहीं की जा सकती है। मौसम का इन पर भारी प्रभाव पड़ता है। यदि प्रतिकूल हवा बहे तो ये शत्रु क्या, मित्र राष्ट्र को भी चपेट में ले सकते हैं। इसके अतिरिक्त इनकी आयु के बारे में भी कुछ नहीं कहा जा सकता है। ये स्थल विशेष के सूक्ष्म जीवों में घुल-मिलकर शत्रु का विनाश करने के बाद भी बने रह सकते हैं।

वर्तमान में जब तक जैविक एवं रासायनिक हथियार हैं तब तक इनका खतरा सदैव मंडराता रहेगा। अत: आज के दौर में जैव आतंकवाद एक यथार्थ है, जिससे बचने के उपाय, नीतियों का गठन और संस्थाओं को तैयार रखने की आवश्यकता है। आज आवश्यकता ऐसी प्रयोगशालाओं की है, जहाँ जैव हथियारों की पहचान एवं नियंत्रण पर शोध की व्यवस्था संभव हो। इतना ही नहीं, ऐसे सभी जीवाणुओं के प्रति वैक्सीनों का उत्पादन, जीवाणुओं के स्पोर पाउडर की पहचान कर सकें। जन समुदाय में इन खतरों के प्रति जागृति के लिये भी पर्याप्त प्रचार-प्रसार करना समय की मांग है, जिससे किसी भी संशय को टालने की बजाय वे तुरंत किसी चिकित्सक या उपयुक्त संस्था में जाकर आवश्यक निदान करा सकें। अत: जैव आतंकवाद से निबटना केवल सरकार का काम नहीं है। इसका सामना करने के लिये प्रशिक्षण, सामुदायिक जागरूकता एवं सतर्कता अनिवार्य है।

भारतीय वैज्ञानिकों ने जैविक एवं रासायनिक हथियारों के मद्देनजर रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) की शाखा डी. एस. एस. आर. डी. ई. ने सेना के लिये नाभिकीय वस्त्र (Nuclear Biological Clothing -एनबीसी) तैयार किया है। इस पर जैविक एवं रासायनिक हथियार का कोई असर नहीं होता है, परंतु संपूर्ण मानव जाति के लिये इन वस्त्रों को उपलब्ध कराना एवं बचाना संभव नहीं है। जैव एवं रासायनिक हथियारों को बेअसर करने वाले वस्त्र का उत्पादन भारत में शुरू हो गया है।

मानवता का संकट

कृत्रिम प्रजनन तकनीक, जीन प्रतिरोपण तकनीक तथा अन्य जैव-तकनीकों के द्वारा ऐसे जंतु बनाना संभव है, जिनका आज तक कोई अस्तित्व नहीं है। आज भले ही वैज्ञानिकों को नए जंतु बनाने की उत्सुकता हो, पर यदि बनते-बनते कहीं कोई ऐसा जंतु बन गया, जो अधिक विकराल हो और मनुष्यों का सफाया करने लगे, तो इससे सारी मानव जाति संकट में पड़ सकती है। इसी प्रकार क्लोनिंग द्वारा एक ही प्रकार के अनेक मनुष्य तैयार किए जा सकते हैं। यहाँ तक कि केवल एक क्लोनित मानव-कोशिका से संपूर्ण मनुष्य तैयार किया जा सकता है। जैविक प्रयोग मनुष्य पर आजमाने में नैतिक खतरे आते हैं। ‘सुपर मैन’ या अतिमानव का जैव-प्रौद्योगिकी द्वारा बनाना नैतिक रूप से उचित नहीं ठहराया जाता है।

मानव-जीनोम संबंधी कानूनी एवं सामाजिक समस्याएँ

जैसा पूर्व में वर्णित किया जा चुका है, आधुनिक अनुसंधान में मिली अभूतपूर्व सफलता के कारण वैज्ञानिकों ने अब मानव जीवन की असली जन्म-कुंडली को जान लिया है, इसका मानचित्र भी तैयार कर लिया है तथा इसका क्रमिक सिलसिला भी प्रस्तुत कर दिया है। वैज्ञानिक अब मानव जीनोम को उसी तरह से पढ़ सकते हैं जैसे किसी विश्वकोष को। वैज्ञानिक अब पहचानने लगे हैं कि कौन सा जीन या जीन-समूह क्या कार्य करता है एवं किस चीज को जन्म देता है। अब हम किसी बैक्टीरिया, पौधे, चूहे, यहाँ तक कि मानव की भी, आनुवंशिकीय संरचना में सोद्देश्य परिवर्तन करने में समर्थ हैं।

परमाणु ऊर्जा के विध्वंसक रूप की तरह मानव-कुंडली या जीनोम का उद्घाटन समूची मानव जाति के लिये परमाणु बमों से भी कहीं अधिक प्रलयंकारी सिद्ध हो सकता है। ‘जीवन-कुंडली’ का उपयोग करके न केवल दूसरी प्रजातियों के क्लोन तैयार किए जा रहे हैं, वरन कुछ वैज्ञानिकों ने मानव का भी क्लोन बनाने के प्रयास आरंभ कर दिए हैं, परंतु यह जानकारी हमारी चिंताओं को बढ़ाएगी, व्यक्तिगत संबंधों में अप्रिय बदलाव लाएगी तथा हमारे जीवन को भी कलंकित करेगी। तो आइए, हम जानें कि मानव क्लोनिंग के खतरे क्या-क्या हैं -

1. मानव क्लोनिंग से प्रजनन में पुरुष की भूमिका समाप्त हो जाने का खतरा उत्पन्न हो गया है। अब यह स्त्री की इच्छा पर निर्भर करेगा कि वह किसके बच्चे की माँ बनना चाहती है, परंतु इसे समाज स्वीकार नहीं करेगा। क्लोन के संदर्भ में केंद्रक प्रदाता, डिंब देने वाली महिला और प्रतिनिधि (सरोगे) माँ की कानूनी स्थिति हमेशा संदेहास्पद रहेगी। अत: मानव क्लोनिंग से ऐसी अनेक सामाजिक एवं कानूनी समस्याएँ उत्पन्न होंगी।

2. अनुसंधानवेत्ताओं ने पाया है कि ‘डॉली’ की कोशिकाओं की आयु वास्तविक आयु से छह वर्ष अधिक है। वस्तुत: जिस भेड़ की कोशिका लेकर डॉली का क्लोन तैयार हुआ, उसकी आयु छह वर्ष थी, अर्थात क्लोन की आयु उतनी ही होगी जितनी पितृ कोशिका की थी और जिसके केंद्रक को मादा अंडाणु में डाला गया था। इसी तरह यदि मानव क्लोन तैयार किया जाता है तो उसकी आयु अपनी पितृ कोशिका के बराबर हो जाएगी, जबकि अभी वह नवजात शिशु ही होगा।

3. क्लोनिंग में बहुत सारी चिकित्सकीय समस्याएँ हैं। कई पशु क्लोन में ही मर जाते हैं। पैदा भी होते हैं तो उनमें मधुमेह, गूर्दों में खराबी और लंबी जीभ जैसी विकृतियाँ देखने में आई हैं। आरंभ में स्वस्थ दिखने वाले क्लोन भी बाद में भयावह विकृतियों के शिकार हो सकते हैं। मानव क्लोनिंग में भी ऐसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।

4. व्यस्क कोशिकाओं से तैयार होने वाले क्लोन के बारे में एक और आनुवंशिक खतरा है। पर्यावरण के संपर्क में आने के कारण हमारे जीवनकाल में उत्परिवर्तक (Mutagen) विकिरण आदि के कारण डीएनए में उत्परिवर्तन तथा अन्य विकृतियाँ उत्पन्न होकर वे विभिन्न कोशिकाओं में एकत्र होती रहती हैं। लैंगिक प्रजनन के तहत माता-पिता के जीन, जो एक-दूसरे के परिपूरक होते हैं, संयोजित हो जाते हैं और इस प्रकार ऐसी विकृतियाँ व्यक्त नहीं हो पातीं, परंतु अलैंगिक प्रजनन में ऐसी विकृतियों से मुक्ति पाने का कोई उपाय नजर नहीं आता। संचित आनुवंशिक विकृतियों के प्रकट होने की संभावना मानव क्लोन बनाने के मामले में एक बहुत बड़ा खतरा है।

5. मानव क्लोन से अपराध बढ़ने की आशंका है। जिस व्यक्ति की कोशिका से भ्रूण बनता है, क्लोन उसका सही प्रति होता है, अर्थात क्लोनिंग से एक ही प्रकार के कई लोग पैदा हो सकते हैं। ऐसे में बहुत संभव है कि अपराध कोई करे और पकड़ा कोई और जाए। एक ही व्यक्ति के एक साथ कई क्लोन तैयार होने पर और भी अनेक प्रकार की सामाजिक व नैतिक समस्याएँ उत्पन्न हो जायेंगी।

6. इस बात की भी विपुल संभावना है कि मुर्दे का क्लोन तैयार हो जाए, यद्यपि इसमें तकनीकी कठिनाइयाँ है। मृत्यु के बाद डीएनए बहुत जल्दी खराब हो जाता है, परंतु मृत या मरणासन्न व्यक्ति की कोशिकाओं को सही अवस्था में सुरक्षित रखा जाए तो उनसे क्लोन तैयार हो सकेंगे। ऐसी स्थिति में बहुत सारी नैतिक, सामाजिक तथा कानूनी समस्याएँ उत्पन्न होंगी।

7. कुछ विचारकों का मत है कि मानव क्लोनिंग से प्राप्त ‘अमरता’ के साथ कई भयावह अभिशाप भी जुड़े हुए हैं। क्लोन शारीरिक रूप से भले ही समरूप हो, परंतु मानसिक स्थिति, स्मृतियाँ, अनुभव, सामाजिक एवं नैतिक मूल्य हमेशा व्यक्तिगत होते हैं। क्लोन समरूप वक्ति तो बन सकता है, परंतु उसका आचरण नितांत भिन्न होगा। मनुष्य के व्यक्तित्व में वातावरण का योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण होता है। क्लोनिंग से स्मृतियों तथा अनुभवों का सातत्य संभव नहीं हो सकेगा। अत: यह सही अर्थ में अमरता नहीं होगी।

8. मानव क्लोनिंग के और भी अनेक नैतिक एवं सामाजिक भय हैं, जैसे सौदागर वृत्ति के कुछ लोग बड़ी संख्या में युवतियों के क्लोन तैयार कर लेंगे। इससे देह-व्यापार, नारी शोषण एवं अपराध को बढ़ावा मिलेगा। अत: मानव क्लोनिंग के संभावित खतरों का कोई अंत नहीं है।

9. जैव-प्रौद्योगिकी के फलस्वरूप लिंग चयन टेक्नोलॉजी भी हमारे देश में भयावह एवं सामाजिक दृष्टि से उपादेय नहीं होगी।

अत: 21वीं शताब्दी में हमें विज्ञान की इन उभरती जैव-प्रौद्योगिकी शाखा का विवेकपूर्ण उपयोग करना होगा। यद्यपि सतत विकास के लक्ष्य की प्राप्ति के लिये जैव-प्रौद्योगिकी के समेकित उपयोग हेतु विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में प्रयत्न किए जा रहे हैं तथा इस दिशा में हमने बहुत सफलता भी प्राप्त कर ली है, परंतु संधारणीय विकास के लिये अभी हमें बहुत विवेकपूर्ण कार्य करने होंगे

एवरेस्ट को अब पर्वतारोहियों से बचाओ


एवरेस्ट को अब पर्वतारोहियों से बचाओ

बाजार की ऊँचाइयों ने हिमालयी ऊँचाइयों को भी नहीं बख्शा। जी हाँ, यह शब्दश: सच है। दुनिया के सबसे ऊँचे पर्वत शिखर माउंट एवरेस्ट (समुद्रतल से 29,029 फुट) को फतह करने का जो पहला साहसिक उपक्रम 29 मई 1953 को सर एडमंड हिलेरी और तेनजिंग नोर्गे ने कर दिखाया था, उसने आज पैसे वालों की ‘एडवेंचर टूरिज्म’ की व्यावसायिक शक्ल अख्तियार कर ली है। नतीजा यह है कि बिलियर्ड की टेबल के आकार के चबूतरे जैसी इस चोटी पर खड़े होने की कथित गौरवपूर्ण उपलब्धि को अपने नाम करने के इच्छुक प्रत्याशियों की लंबी कतार लगने लगी है।

चोटी तक के सफर की आखिरी बाधा, ‘हिलेरी स्टेप’ के नाम से मशहूर 40 फुट ऊँची सीधी खड़ी पहाड़ी पर लगने वाली कतार की वजह से ‘पर्वतारोहियों’ को वहाँ अब घंटों इंतजार करना पड़ता है। इस इंतजार के चलते कोई ऑक्सीजन सिलिंडर खत्म हो जाने के कारण, तो कोई बर्फीले तूफान के थपेड़ों के कारण दम तोड़ देता है। पिछले साल 10 पर्वतारोहियों ने जान गँवाई थी, तो इस साल अब तक सात मारे जा चुके हैं। 60 वर्षों में इस तरह 300 से ज्यादा पर्वतारोही जान गँवा चुके हैं।

मौसम के लिहाज से मई के आखिरी पखवाड़े को एवरेस्ट की चढ़ाई के लिये सबसे अनुकूल माना जाता है और सुबह के 11 बजे तक ही चढ़ाई की जा सकती है। इस कारण मारामारी मचती है। खबर है कि इस साल अब तक 520 से ज्यादा पर्वतारोहियों ने एवरेस्ट फतह कर लिया है। इनमें भारत की विकलांग प्रशिक्षु पुलिस अधिकारी अरुणिमा सिन्हा और जापान के 80 वर्षीय युइचिरो मिउरा शामिल हैं। मिउरा ने इस उम्र में चढ़ाई करके सबसे उम्रदराज एवरेस्ट विजेता का खिताब हासिल किया, तो 2010 में 13 वर्षीय अमेरिकी लड़के जॉर्डन रोमेरो ने सबसे कम उम्र एवरेस्ट विजेता का। हर साल ३35,000 से ज्यादा लोग इस पर्वत क्षेत्र की सैर करते हैं और 60 वर्षों में 6,149 पर्वतारोही एवरेस्ट फतह कर चुके हैं। इसकी होड़ कुछ इस तरह बढ़ चुकी है कि लोग अलग-अलग तरह के रिकॉर्ड अपने नाम करवाने में जुट गए हैं। कोई बिना ऑक्सीजन के एवरेस्ट फतह करने का कारनामा कर रहा है; तो कोई सबसे कम समय में, कोई सबसे कम उम्र में तो कोई सबसे ज्यादा उम्र में और कोई सबसे ज्यादा बार चोटी तह करने का आंकड़ा अपने नाम कर रहा है। हाल के वर्षों में ऐसे रिकॉर्ड बनाने की सनक तो इस होड़ को बढ़ा ही रही है, पर्वतारोहण की तकनीक में सुधार और व्यावसायिक मुनाफाखोरी भी एवरेस्ट पर भीड़ बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रही है।

गुड़गाँव स्थित ‘इक्सीगो डॉटकॉम’ सरीखे अनेक वेब पोर्टल शौकिया पर्वतारोहियों के लिये एवरेस्ट चढ़ाई से संबंधित छोटी से छोटी जानकारियाँ उपलब्ध करा रहे हैं, तो दुनियाभर में ट्रैवल एजेसियाँ इस पूरे अभियान के ठेके लेने को तैयार हैं। हिमालय क्षेत्र के शेरपा चढ़ाई के दौरान विभिन्न ठिकानों पर तमाम अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस तंबू लगाने से लेकर चोटी-दर-चोटी रस्सियां तान कर चढ़ाई को आसान बनाने के लिये उपलब्ध हैं। ‘नेशनल जियोग्राफिक’ पत्रिका के मुताबिक, 1990 में अगर इस अभियान की सफलता दर मात्र 18 प्रतिशत थी, तो 2012 में वह बढ़कर 56 प्रतिशत तक पहुँच गई है। इस अभियान में पर्वतारोही को 10 हजार डॉलर से लेकर 1 लाख डॉलर तक खर्च आ सकता है, जिसमें नेपाल सरकार द्वारा जारी की जाने वाली परमिट का खर्च भी शामिल है। नेपाल सरकार 10 पर्वतारोहियों के दल को परमिट देने लिये 70,000 डॉलर की फीस लेती है। इस अभियान के लिये प्रायोजकों की कमी भी नहीं है। हिलेरी-नोर्गे के अभियान को करीब 100 ब्रिटिश कंपनियों ने प्रायोजित किया था।

लेकिन तब और अब में काफी फर्क आ चुका है। उन दिनों यह पूरे सीजन तक चलने वाला लंबा अभियान होता था। पर्वतारोही काठमांडो से शुरुआत करते थे और करीब महीने भर में हिमालय के नीचे आधार शिविर में पहुँचते-पहुँचते तक अपने शरीर का तालमेल पूरे परिवेश और मौसम के साथ बिठा लेते थे। आज पर्वतारोही विमान से सीधे वहाँ उतरते हैं और लगभग तीन महीने में ही एवरेस्ट फतह कर डालते हैं। हिलेरी और नोर्गे ने तो अपनी शालीनता का परिचय देते हुए यह स्पष्ट नहीं किया था कि चोटी पर उनमें से किसने पहले कदम रखा लेकिन आज के पर्वतारोही इतनी हड़बड़ी में होते हैं कि वे रास्ते में बीमार-घायल पर्वतारोहियों की मदद करने की जहमत तक नहीं उठाते।

बल्कि वे तो आपस में धक्कामुक्की और झगड़े तक करने से बाज नहीं आते। खबर है कि पिछले साल तीन पर्वतारोहियों ने जब 50 हजार डॉलर तक खर्च करने वाले अमीर पर्वतारोहियों के लिये रस्सियाँ तान रहे शेरपाओं से आगे निकलने की कोशिश की तो उनके बीच बकझक और मारपीट भी हुई। जाहिर है कि सहनशीलता और विनम्रता की परीक्षा लेने वाला यह अभियान पैसे के रौब और अधैर्य के कारण अपनी गरिमा खो रहा है। इससे भी खतरनाक बात यह है कि इन अभियानों के कारण एवरेस्ट कूड़े के ढेर में तब्दील हो रहा है।

ऑक्सीजन के खाली कनस्तर, फटे तंबुओं के टुकड़े, मानव शव, मानव मल समेत तमाम तरह के साजोसामान तलहटी से लेकर चोटी तक बिखरे नजर आते हैं। इस कचरे से चिंतित ‘इको एवरेस्ट एक्सपीडिशन’ सरीखे पर्यावरण प्रेमियों के दल एवरेस्ट की सफाई का सालाना अभियान चला रहे हैं। यह दल 2008 से अब तक वहाँ से करीब १३ टन कचरे की सफाई कर चुका है, तो भारत-नेपाल सेनाओं के एक संयुक्त दल ने हाल में दो टन कचरा साफ किया है। कलाकारों का दल भी करीब डेढ़ टन कचरा लेकर नीचे आया है और उन्हें कलाकृतियों में तब्दील करके उनकी बिक्री से इस अभियान को आगे बढ़ाने में मदद करना चाहता है। फिर भी, माना जाता है कि 10 टन कचरा अभी भी उन पहाड़ियों में बिखरा पड़ा है।

एक ओर ‘ग्लोबल वार्मिंग’ के कारण पहले ही हिमालय की हिमनदों के पिघलने के कारण गंगा, मेकोंग, यांगत्जे जैसी बड़ी नदियों के (जो दो अरब आबादी के जीवनस्रोत हैं) जलस्रोतों के लुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है, तो एवरेस्ट पर बढ़ती भीड़ और कचरा इस खतरे को और बढ़ाने का काम ही कर रहा है। खतरे की एक और घंटी यह है कि इस भीड़ पर लगाम लगाने की कोशिशों की जगह उसे और सुविधाएँ प्रदान करने पर विचार किया जा रहा है। चोटी पर चढ़ने वालों की कतार को जल्दी निबटाने के लिये ‘हिलेरी स्टेप’ से चोटी तक एक सीढ़ी बना देने पर विचार किया जा रहा है। पिछले साल परमिटों की बिक्री से 1.2 अरब डॉलर कमाने वाला नेपाल क्या एवरेस्ट को बचाने के लिये परमिट की फीस बढ़ाने की पहल करेगा? क्या विश्व समुदाय इस दिशा में कोई कदम उठाएगा

Wednesday, 14 December 2016

भारत का प्रक्षेपास्त्र विकास कार्यक्रम India's Missile Development Program

भारत का प्रक्षेपास्त्र विकास कार्यक्रम India's Missile Development Programme
5 घोषित परमाणु राज्यों (चीन, ब्रिटेन, फ़्रांस, रूस, और संयुक्त राज्य अमेरिका) के बाद, भारत के पास सबसे उन्नत मिसाइल कार्यक्रमों में से एक है| भारत अपने परिष्कृत मिसाइल और अंतरिक्ष कार्यक्रमों के साथ, देश में ही लंबी दूरी की परमाणु मिसाइलों के विकास में तकनीकी रूप से सक्षम है। बैलिस्टिक मिसाइलों में भारत का अनुसंधान 1960 के दशक में शुरू हुआ। जुलाई 1983 में भारत ने स्वदेशी मिसाइल के बुनियादी ढांचे को विकसित करने के उद्देश्य के साथ

समन्वित निर्देशित प्रक्षेपास्त्र विकास कार्यक्रम (Integrated Guided  Missile Development Program- IGMDP) शुरुआत की। आईजीएमडीपी द्वारा देश में ही विकसित सबसे पहली मिसाइल पृथ्वी (पृथ्वी) थी। भारत की दूसरी बैलिस्टिक मिसाइल प्रणाली, अग्नि (आग) मिसाइलों की श्रृंखला है, जिसकी मारक क्षमता पृथ्वी मिसाइलों से ज्यादा है, साथ ही अग्नि मिसाइलों से अधिक उन्नत भी है|

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भारत की विभिन्न मिसाइलें उसकी सुरक्षा प्रणाली का बेहद अहम हिस्सा है| अग्नि मिसाइलें भारतीय मिसाइल प्रणाली की रीढ़ हैं| भारत की कुछ प्रमुख मिसाइलें इस प्रकार हैं-

बैलिस्टिक मिसाइल Ballistic Missiles

पृथ्वी मिसाइल प्रणाली Prithvi missile system

भारत में सबसे पहले छोटी दूरी के लिए पृथ्वी मिसाइलों का विकास शुरू किया| इन मिसाइलों का विकास 1983 में हैदराबाद में शुरू किया गया और इसका पहला परीक्षण श्रीहरिकोटा, शार केंद्र (SHAR-‘Sriharikota Range’ now ‘Satish Dhawan Space Centre’) नेल्लोर जिले, आंध्र प्रदेश से 25 फ़रवरी 1988 को किया गया|पृथ्वी-1 भारत में विकसित स्वदेशी तकनीकी से बनी बैलिस्टिक मिसाइल थी, जिसकी क्षमता 150 किमी. थी| पृथ्वी मिसाइलों के कई संस्करण हैं- जिनमे पहला था

SS-150 या P1, जिसकी क्षमता 150 किमी. है| दूसरा संस्करण SS-250 या P2 है, जिसकी क्षमता 250 किमी. तक है| 350 किमी तक मारक क्षमता वाली पृथ्वी-III मिसाइलों का परीक्षण सन 2004 में किया गया| पृथ्वी-1 मिसाइलों का प्रयोग भारतीय थल सेना द्वारा किया जाता रहा, और पृथ्वी-II मिसाइलों का प्रयोग भारतीय वायुसेना द्वारा किया जाता है| पृथ्वी मिसाइलों के नौसैनिक संस्करण को धनुष (Dhanush) मिसाइल के नाम से भी जाना जाता है| जो पृथ्वी-1 और पृथ्वी-2 मिसाइलों का ही विकसित रूप है| वास्तव में पृथ्वी मिसाइलों का विकास नाभिकीय अस्त्र लि जाने के लिए किया गया था, परन्तु अधिक उन्नत अग्नि मिसाइलों के सफल परीक्षण के बाद इन मिसाइलो पर नाभिकीय अस्त्रों की आवश्यकता नहीं रह गयी| धनुष मिसाइलों का पनडुब्बी संस्करण भी विकसित करने के प्रयास किया जा रहा है|

पृथ्वी-I व पृथ्वी-II मिसाइलें तरल ईंधनों से युक्त थीं|पृथ्वी-III मिसाइलें एक चरण वाले ठोस ईंधनो से युक्त होती हैं, जिससे ये मिसाइलें विभिन्न स्थानों और परिस्थितियों में बहुत ही कम समय में तैयार करके दागी जा सकती हैं| पृथ्वी-1 मिसाइलें 1994 में भारतीय सेना में शामिल की गयीं, जिनका संचालन सिकंदराबाद में भारतीय सेना के 333वें मिसाइल समूह द्वारा किया जाता रहा| 444वें मिसाइल समूह की स्थापना मई 2002 में की गयी जो पृथ्वी और अग्नि-1 मिसाइलों के संचालन की देख-रेख करता है|

पृथ्वी मिसाइलों SS-150 का उत्पादन 1993 में शुरू हुआ, और 1999 तक लगभग 60 मिसाइलें बनायीं गयीं| इनके प्रक्षेपण के लिए 35 प्रक्षेपण वाहनों (transport erector launcher-TEL)का भी निर्माण किया गया|

पृथ्वी-II या SS-250 को भारतीय वायु सेना में 1999 में शामिल किया गया और आक अनुमान के अनुसार लगभग 70 मिसाइलों का निर्माण किया गया| बाद में इनका नियंत्रण, मिसाइल संचालन करने वाले थल सेना के समूह को दे दिया गया, जो अपने लक्ष्यों के लिए वायुसेना के संपर्क में रहता है|

पृथ्वी-III मिसाइलों परीक्षण नवम्बर 1993 और अप्रैल 2001 में किया गया, परन्तु अभी यह निश्चित नहीं है की इनका विकास आगे किया जा रहा है या नहीं|

युद्ध-पोतों से प्रक्षेपित की जा सकने वाली पृथ्वी मिसाइलों के नौसैनिक संस्करण धनुष का परीक्षण आई.एन.एस. सुभद्रा से अप्रैल 2000 में किया गया| यह परीक्षण असफल रहा| इसके दूसरे परीक्षण दिसम्बर 2000 और सितम्बर 2001 में किये गए, जिसमे इन मिसाइलों ने 150 किमी. की निर्धारित दूरी तय की|

पृथ्वी मिसाइलें सभी प्रकार के पारंपरिक और सामरिक हथियार ले जाने में सक्षम हैं|

मिसाइलपेलोडक्षमता (दूरी)ईंधन एवं चरणपृथ्वी-I1000 किग्रा., सभी प्रकार के हथियार के जाने में सक्षम150एक चरण, तरल ईंधनपृथ्वी-II350-750 किग्रा., सभी प्रकार के हथियार के जाने में सक्षम250-350एक चरण, तरल ईंधनपृथ्वी-III500-1000 किग्रा., सभी प्रकार के हथियार के जाने में सक्षम350-600एक चरण, ठोस ईंधन

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अग्नि मिसाइल प्रणाली Agni missile system

भारत ने मध्यम दूरी की, सतह से सतह पर मार करने वाली, अग्नि मिसाइल प्रणाली पर 1979 में कम शुरू किया और इनका पहला परीक्षण 1989 में किया गया| परन्तु उत्तरोत्तर सरकारों ने अन्तर्राष्ट्रीय दबावों में इसके अगले परीक्षण नहीं किये| अग्नि -1 का परीक्षण 1990 के मध्य में किया गया, और इसे प्रौद्योगिकी का विकास (technology demonstrator) बताया गया| 1998 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी की अगुवाई वाली सरकार ने अग्नि मिसाइलों के विकास को नई दिशा दी| इस प्रकार 1999 में अग्नि –II का परीक्षण किया गया, और सन 2002 में अग्नि-I का भी परीक्षण किया गया| अग्नि मिसाइलें अंतरवर्ती दूरी (Intermediate-Range Ballistic Missile-IRBM)  तक प्रहार करने वाला बैलिस्टिक प्रक्षेपास्त्र है| इसमें मुख्य रूप से ठोस प्रणोंदकों का ही इस्तेमाल होता है (SLV-3 के समान)| अग्नि मिसाइलों का ताप परिरक्षक (Heat Shield) कार्बन सम्मिश्रणों (composite) का बना होता है, जिसके कारण ये उच्च तापमान लगभग 5000°C, को भी सहन कर सकती हैं| अमेरिका, रूस, फ़्रांस, इजराइल और चीन के बाद भारत ऐसी प्रणाली विकसित करने वाला 6वां देश है|

अग्नि-1 Agni – I

कम दूरी के लिए अग्नि-I का विकास 1999 में शुरू हुआ| यह 1990 में परीक्षण की गयी अग्नि मिसाइलों पर ही आधारित था| अपने पेलोड के साथ इसकी मारक क्षमता 1200 किमी. तक है| अग्नि-I का विकास कम समय में परमाणु क्षमता प्रदान करने के लिए किया गया है|  परमाणु क्षमता संपन्न अग्नि - 1 प्रक्षेपास्त्र का ताजा परीक्षण 25 नवंबर 2010 एवं दिसंबर 2011 में किया गया| अग्नि - 1 को पहले ही भारतीय सेना में शामिल कर लिया गया है लेकिन सेना से जुड़े लोगों के प्रशिक्षण और उनकी कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए इसका समय-समय पर प्रायोगिक परीक्षण किया जाता है|

अग्नि-2 Agni – II

2000 किमी. की मारक क्षमता वाली अग्नि – II मिसाइलों का सबसे पहले परीक्षण अप्रैल 1999 में किया गया था| 2009 में इनका दो बार परीक्षण असफल हो गया था| मई 2010 में इसका सफल परीक्षण किया गया| ये एक टन तक का पेलोड ले जा सकती है| सितंबर 2011 में एक बार फिर अग्नि-2 का सफल परीक्षण किया गया. अग्नि-2 भारतीय सेना में शामिल की जा चुकी है|

अग्नि-3 Agni – III

3500 किमी. की मारक क्षमता वाली, और 1.5 टन तक का पेलोड लि जा सकने में सक्षम अग्नि-3 मिसाइलों को 2006 में परीक्षण किया जिसे आंशिक रूप से ही सफल बताया गया| 2007 और 2008 में अग्नि-3 का सफल प्रशेपण किया गया| अग्नि-3 का चौथा परीक्षण फरवरी 2010 में उड़ीसा के पास व्हीलर आईलैंड में किया गया|

अग्नि – 4 Agni – IV

3000 किमी. से अधिक मारक क्षमता, 1000 किग्रा. से अधिक पेलोड ले जाने में सक्षम अग्नि-4 मिसाइलों का सफल प्रक्षेपण नवंबर 2011 में किया गया| ये मिसाइलें अपने पूर्ववर्ती संस्करणों से हल्की, परन्तु तकनीकी रूप से अधिक उन्नत हैं| इनका पहला परीक्षण दिसम्बर 2010 में हुआ था, परन्तु तकनीकी कारणों से ये परीक्षण असफल रहा था| अग्नि-3 मिसाइलें अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल (intercontinental ballistic missile, ICBM) हैं|

अग्नि मिसाइलें सभी प्रकार के पारंपरिक और सामरिक हथियार ले जाने में सक्षम हैं| नई तकनीकों जैसे अति आधुनिक कम्प्यूटर और नेवीगेशन सिस्टम के इस्तेमाल के कारण ये मिसाइलें अचूक हैं| अग्नि मिसाइलों की श्रृंखला को डीआरडीओ (Defense Research and Development Organization, DRDO) द्वारा विकसित किया गया है और भारत डायनामिक्स लिमिटेड (Bharat Dynamics Limited) द्वारा इनका  निर्माण किया जाता है|

अग्नि -5 Agni – V

भारत ने अपनी पहली अंतरमहाद्वीपीय दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल अग्नि-5 का परीक्षण अप्रैल 2012 में किया| 5000-8000 किमी की मारक क्षमता वाली इस मिसाइल को भी MIRV के रूप में विकसित किया गया है, जो एक बार में 3 से ज्यादा हथियारों को ले जाने में सक्षम है|

अग्नि-6 Agni-VI

इनके आलावा अग्नि-VI का विकास, 2008 में आईजीएमडीपी कार्यक्रम के समाप्त होने के बाद, डीआरडीओ द्वारा किए गए नीति में परिवर्तन के अनुसार स्वतंत्र परियोजनाओं के तहत किया जा रहा है| अग्नि-VI कोभीमल्टीपल इंडिपेंडिबल री- एंट्री व्हीकल यानी एमआईआरवी (Multiple independently targetable reentry vehicle-MIRV) के रूप में विकसित करने के प्रयास किये जा रहें हैं, जो एक बार में 4-6 हथियार ले जाने में सक्षम होगा|

मिसाइलपेलोडक्षमता (दूरी)ईंधन एवं चरणअग्नि-11000, सभी प्रकार के हथियार ले जाने में सक्षम700-1250एक चरण, ठोस ईंधनअग्नि-2750-1000, सभी प्रकार के हथियार ले जाने में सक्षम2000-3500ढाई चरण, ठोस ईंधनअग्नि-32000-2500, सभी प्रकार के हथियार ले जाने में सक्षम3500-5000दो चरण, ठोस ईंधनअग्नि-4800-1000, सभी प्रकार के हथियार ले जाने में सक्षम3000-4000दो चरण, ठोस ईंधनअग्नि-51500, सभी प्रकार के हथियार ले जाने में सक्षम, विकास के अंतर्गत5500-5800तीन चरण, ठोस ईंधनअग्नि-61000, सभी प्रकार के हथियार ले जाने में सक्षम, विकास के अंतर्गत6000-8000तीन चरण, ठोस ईंधन

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त्रिशूल मिसाइल प्रणाली Trishul Missile System

त्रिशूल मिसाइल सतह से हवा में मार करने वाली पहला स्वदेशी सक्षम प्रक्षेपास्त्र है| इसे सेना के तीनो अंग प्रयोग कर सकते हैं| इसकी मारक क्षमता 500 मी. से लेकर 12 किमी. तक है| यह 5.5 किग्रा. तक के विस्फोटकों को के जा सकती है, इलेक्ट्रॉनिक संसूचकों (detector) की मदद से लक्ष्य के करीब इनमे विस्फोट होता है| इनमे ठोस प्रणोदकों का इस्तेमाल होता है| भारत ने आधिकारिक तौर पर 27 फ़रवरी 2008 के बाद त्रिशूल मिसाइल परियोजना बंद कर दी, परन्तु तकनीकी दक्षता हासिल करने के लिए इसका परीक्षण किया जा सकता है|

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धनुष मिसाइल Dhanush Missile

पृथ्वी और अग्नि मिसाइल की सफलता के बाद भारतीय वैज्ञानिकों ने समुद्र से सतह पर प्रहार करने वाली धनुष मिसाइल को विकसित किया| यह मिसाइल पृथ्वी मिसाइल का ही नौसैनिक संस्करण है| इसे डीआरडीओ ने विकसित किया है और निर्माण भारत डाइनेमिक्स लिमिटिड द्वारा इसका निर्माण किया जाता है| यह 500 किग्रा. तक के पेलोड ले जाने में सक्षम है|

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आकाश मिसाइल प्रणाली Akash missile system

सतह से हवा में मार करने में सक्षम आकाश मिसाइलें माध्यम दूरी के प्रक्षेपास्त्र हैं, जिनकी मारक क्षमता 25-30 किमी. है| आकाश मिसाइलें 2.5 मैक की पराध्वनिक रफ़्तार पर उडती हैं| ये 18 किमी. तक की ऊंचाई तक भी जा सकती हैं| अक्सः मिसाइलें 55 किग्रा. तक के वॉरहेड्स का वहन कर सकती हैं| ये मिसाइलें रैमजेट तकनीक पर आधारित हैं| इनमे दो चरणों वाले ठोस प्रणोदकों का इस्तेमाल होता है| आकाश मिसाइलें देश में ही विकसित राजेन्द्र राडार से एकीकृत होती हैं, जिनके द्वारा इन्हें निर्देश दिया जाता है| इस मिसाइलों का पूर्ण रूप से राडार द्वारा ही नियंत्रण किया जाता है|

आकाश मिसाइलों का विकास 1990 में शुरू किया गया था और इनका पहला परीक्षण मार्च 1997 में किया गया था|

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नाग मिसाइल Nag Missile  

दागो और भूल जाओ (Fire-and-forget) के सिद्धांत पर विकसित नाग मिसाइल एक टैंक रोधी (anti-tank missile) है, जिसकी क्षमता 3-7 किमी है| इसमें ठोस प्रणोदकों का इस्तेमाल होता है| नाग मिसाइलों में अवरक्त प्रतिविम्ब प्रणाली (Imaging Infra-Red, IIR) का प्रयोग किया जाता है, जिसके कारन दिन और रात दोनों समय इससे अचूक निशाना लगाया जा सकता है| नाग मिसाइलों का हेलीकाप्टर में प्रयोग किया जा सकने वाला संस्करण भी विकसित किया जा चुका है, जिसे हेलिना (HELINA - HELIcopter NAg) के नाम से जाना जाता है| इसे HAL द्वारा विकसित ध्रुव हेलीकाप्टरों में लगाया गया है|

इन मिसाइलों के प्रक्षेपण के लिए एक थर्मल इमेजर से लैस विशेष वाहन नामिका (NAMICA-Nag Missile Carrier) का भी विकास किया गया है|

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पिनाका मल्टी बैरल रॉकेट लांचर Pinaka Multi Barrel Rocket Launcher

पिनाका मल्टी बैरल रॉकेट प्रणाली को जिसे भारतीय सेना के लिए रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) द्वारा विकसित किया गया है| ये प्रणाली अधिकतम 40-65 किमी. तक के पाने लक्ष्यों को भेद सकती है| इस प्रणाली से 44 सेकंड में 72 रॉकेट दागे जा सकते हैं, जो 4 वर्ग किमी. के क्षेत्र को तबाह कर सकते हैं| इसके अलग-अलग राकेटों को अलग-अलग दिशा में भी दागा जा सकता है| इस प्रणाली की गतिशीलता के लिए इसे एक टाट्रा (Tatra) ट्रक पर लगाया जाता है| पिनाका मिसाइल प्रणाली का विकास 1986 में शुरू हुआ था और दिसम्बर 1992 में इस पर काम पूरा हुआ|

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निर्भय मिसाइल Nirbhay Missile

17 अक्टूबर, 2014 को भारत ने DRDO द्वारा स्वदेशी तकनीकी से विकसित देश की पहली अध्वनिक (subsonic) मिसाइल निर्भय का परीक्षण किया| टर्बोजेट इंजन और ठोस प्रणोदकों पर आधारित इस मिसाइल की रफ़्तार 0.65 मैक है| यह मिसाइल 450 किग्रा. तक के पेलोड के साथ 800-1000 किमी. की दूरी तक मार करने में सक्षम है| इस मिसाइल में एक खास तरह का फायर एंड फोरगेट सिस्टम लगा है, जिसे जाम नहीं किया जा सकता। यह मिसाइल उच्च तकनीक पर आधारित है, इसे सामान्य मिसाइलों की तरह ही प्रक्षेपित किया जाता है, लेकिन एक निश्चित ऊंचाई पर पहुँचने के बाद इसमें लगे पंख खुल जाते हैं, और यह एक विमान की तरह काम करने लगती है|

निर्भय मिसाइल कई विशेषताओं से युक्त है, जैसे यह कम ऊंचाई पर उडती है जिसकी वजह से यस राडार के पकड़ में आसानी से नहीं आती| इसे दूर से नियंत्रित किया जा सकता है, लक्ष्य के पास पहुँचाने के बाद ये उसके इर्द-गिर्द चक्कर लगा सकती है और सटीक मौके पर हमला कर सकती है| ये मिसाइलें काफी कुशल हैं, जिन्हें भिन्न-भिन्न पेलोड के साथ विभिन्न प्लेटफार्म से प्रक्षेपित किया जा सकता है| इस मिसाइल को प्रमुख तौर पर वायु सेना और नौसेना के लिए विकसित करने की योजना है|

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प्रहार मिसाइल Prahaar Missile

प्रहार कम दूरी की (Short-Range Ballistic Missile, SRBM) बैलिस्टिक मिसाइल है, जिसे तुरंत प्रतिक्रिया देने के लिया विकसित किया गया है| यह मिसाइल 250 सेकेंड के भीतर, 150 किमी की दूरी तक अपने लक्ष्यों को भेद सकती है| इस नई मिसाइल से वर्तमान मल्टी बैरल रॉकेट प्रणाली वाली पिनाका और परमाणु सामग्री ले जाने में सक्षम पृथ्वी मिसाइलों के बीच के अंतर को दूर किया जा सकेगा। पिनाका 40 किलोमीटर तक जबकि पृथ्वी 350 किलोमीटर तक के लक्ष्य को भेद सकती है। एक चरण वाले ठोस ईंधनों से युक्त यह मिसाइल 200 किग्रा. तक का पेलोड ले जा सकने में सक्षम है| इस मिसाइल का पहला परीक्षण जुलाई 2011 में किया गया था|

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शौर्य मिसाइल  Shaurya Missile

सतह से सतह पर वार करने में सक्षम मध्यम दूरी की मारक क्षमता वाली बैलिस्टिक मिसाइल 'शौर्य' का सफलतापूर्वक परीक्षण सितम्बर 2011 में किया गया था| इस मिसाइल का पहला परीक्षण 2004 में किया गया था| शौर्य मिसाइलों की मारक क्षमता 700 किमी. है| दो चरणों वाले ठोस प्रणोदकों से युक्त यह मिसाइल 500-800 किग्रा. तक का पेलोड ले जा सकती है| यह मिसाइल जमीन के अलावा पानी के भीतर से भी छोड़ी जा सकती है|

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सागरिका मिसाइल Sagarika (K-15) Missile

भारत ने समुद्र से प्रक्षेपित की जा सकने वाली बैलिस्टिक मिसाइल (Sea Launched Ballistic Missile, SLBM) का भी विकास किया है| सागरिका का परीक्षण 2008 में किया गया था| DRDO द्वारा विकसित यह मिसाइल 500-800 किग्रा. के पेलोड के साथ 700 किमी. की दूरी तक के लक्ष्यों को निशाना बना सकती है| इसमें दो चरणों वाले ठोस प्रणोदकों का इस्तेमाल होता है| शौर्य मिसाइल इसका जमीनी संस्करण ही है|

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सूर्य मिसाइल Surya Missile

भारत एक अंतर-महाद्वीपीय दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल (Intercontinental Range Ballistic Missile-IRBM) विकसित करने का प्रयास कर रहा है, जो एक MIRV मिसाइल होगी| यह मिसाइल 2500 किमी. के पेलोड के साथ 8000-10000 किमी. की दूरी तक लक्ष्यों को भेदने में सक्षम होगी| इसका पहला परीक्षण 2015 में होने की सम्भावना है|

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ब्रह्मोस प्रक्षेपास्त्र BrahMos Missile (PJ-10)

ब्रह्मोस मिसाइल भारत और रूस के द्वारा विकसित की गयी पराध्वनिक (supersonic) मिसाइल है| यह अब तक की सबसे आधुनिक मिसाइल प्रणाली है, जिसने भारत को मिसाइल तकनीक में अग्रणी देश बना दिया है| इसकी गति और सटीकता के कारण, ब्रह्मोस को सबसे दुर्जेय क्रूज मिसाइलों में से एक माना जाता है। 12 फरवरी 1998 को भारत में डीआरडीओ और रूस के एनपीओ मशीनोस्त्रोयेनिशिया (DRDO and Mashinostroyenia-NPOM) के बीच एक समझौता हुआ और ब्रह्मोस एयरोस्पेस (BrahMos Aerospace) का गठन किया गया| ब्रह्मोस नाम भारत की ब्रह्मपुत्र और रूस की मस्कवा (Brahmaputra and Moscow) नदी पर रखा गया है। इस सयुंक्त उपक्रम का उद्देश्य था विश्व के सबसे पसले सुपरसोनिक मिसाइलों को विकसित करना और बेचना|

डीआरडीओ के डा. ए. शिवथानु पिल्लई (Dr. A. Shivathanu Pillai) और एनपीओ के डॉ. हर्बर्ट येफ्रेमोव (Dr. Herbert Yefremov) ने इस मिसाइल को विकसित करने में अहम् भूमिका निभाई|

ब्रह्मोस मिसाइल का पहला परीक्षण 12 जून 2001 को, उड़ीसा तटीय क्षेत्र में चाँदीपुर के एकीकृत परीक्षण स्थल (Interim Test Range off

The Chandipur coast in Orissa - ITR) से किया गया| अब तक इसके कई संस्करण विकसित किये जा चुके हैं| रैमजेट तकनीक पर आधारित ब्रह्मोस सुपरसोनिकमिसाइल 200-300 किग्रा पेलोड के साथ 300 किमी.की दूरी पर अपने लक्ष्यों को भेद सकती है| इस मिसाइल को जमीन से, हवा से, पनडुब्बियों से, युद्ध पोतो से अर्थात कहीं से भी प्रक्षेपित किया जा सकता है| ब्रह्मोस के मेनुवरेबल संस्करण का भी परीक्षण किया जा चुका है, जिससे प्रक्षेपित किये जाने के बाद अपने लक्ष्य तक पहुँचने से पहले ही इसका मार्ग बदला जा सकता है|

भारत की भविष्य में ब्रह्मोस-2 नाम से हाइपर सोनिकमिसाइल मिसाइल बनाने की भी योजना है, जो 7 मैक की गति से अपने लक्ष्यों को भेदने में सक्षम होगी| इस मिसाइल का विकास भारत को बिना रूस की सहायता से अपने दम पर करना होगा, क्योंकि रूस ने अंतरराष्ट्रीय मिसाइल तकनीक नियंत्रण संधि (Missile Technology Control Regime-MTCR) पर हस्ताक्षर किये हैं, जिसके कारण वह 300 किमी से अधिक मारक क्षमता वाली मिसाइल के विकास में अन्य देशों को मदद नहीं दे सकता है।

ब्रह्मोस मिसाइलों को थल सेना एवं नौसेना में शामिल किया जा चुका है।